Dhyan Yog Jan Jagruti Seva Sansthan

Guru Purnima Mahotsav 2022

12-13 July 2022

guru purnima 2022

स्नेहिल जीवन प्रभात- जागो प्यारे जागो !

🌷🌷मेरे जन्म का हेतु अकारण नहीं, बड़ी विशेष संयोजन के साथ इस धरा पर आया हूँ, तुम मेरे साथ चल सकोगे तो मैं तुम्हें जीवन का आनंद, सर्वोत्तम जीवन जीने की एक सुन्दर क्रिया सीखा जाऊँगा पर मेरे विपरीत ध्रुव पर बहे तो कचरे की भाँती तुम किनारे पर छूट जाओगे ! मैं तो अमरता का घूट देने के लिए आया था पर तुम तो स्वयं ही जीवन को विष के रूप में पिए जा रहे हो, मेरी चेतना अमृतपान की ओर है और तुम्हारी चेतना विषपान की ओर, अगर तुम स्वयंभू हो जाओ तो तब तो तुम्हारा विषपान करना उचित है पर यदि तुमने चेतना के शिखर को नहीं छूआ, शिव के सामान संसार से विलगता नहीं बना पाए तो सांसारिक संबंधों का ये विषपान तुम्हें अकारण मृत्यु दे जाएगा……………

🌷🌷प्रेम ही एक कारण जिससे तुम अमृतपान कर सकते हो, प्रेम ही एक आधार है जिसके माध्यम से तुम जी सकते हो, प्रेम को छोड़कर यदि प्रपंच की दुनिया में प्रवेश करोगे तो तुम्हें पीड़ा ही पीड़ा मिलने वाली है ! एक तुम्हारा सम्बन्ध ईश्वर से है, शाश्वत है, सांसारिक सम्बन्ध सिर्फ दिखावे के लिए है और ऐसे संबंधों में यदि सड़न गलन की शुरुवात हो जाए तो ऐसे सम्बन्धो का त्याग कर देना तुम्हारे जीवन के लिए समुचित होगा, किसी भी कारण वश शरीर का कोई अंग जब सड़ने लगता तब ज्ञान और विज्ञान दोनों ही कहता है कि उसे शरीर से अलग कर दो बाकि शरीर स्वस्थ रहे, अगर तुम इस विज्ञान, इस ज्ञान को नहीं समझोगे तो तुम्हारा स्वयं का शरीर समाप्त हो जायेगा……………

🌷🌷सम्बन्धो की परिभाषा प्रेम से है और जहाँ प्रेम ही नहीं है तो प्रकृति स्वयं ही विलगता सुनिश्चित कर देती है और अगर मोह वश तुम उसे धारण करना चाहोगे तो तुम स्वयं ही दुर्गति की ओर बढ़ जाओगे ! शिव भी सती का साथ नहीं दे पाए क्यूंकि सती का स्वभाव जीवन अंत की ओर था, प्रकृति का नियम प्रेम को चुनना और प्रपंच को समाप्त कर देना है, जिसे तुम सृष्टि का संचालक मानते हो, जिसे तुम विधाता कहते हो वह स्वयं भी तुम्हारे स्वभाव को परिवर्तित नहीं कर पाता, फिर नयी संरचना करने के लिए वह तुम्हारे रूप में कुरूतियों को समाप्त कर देता है…………..

🌷🌷तुम दुर्भावना में, दुर्व्यवहार में, दुर्विचार में रहोगे तो तुम कल्पना न करना की शिव तुम्हे धारण करेगा, भगवान हमेशा प्रकाश को धारण करता है क्यूंकि वह स्वयं प्रकाश स्वरूप है, तुम अज्ञान, अंधकार को धरण कर इस संसार सागर में विचरण करोगे तो तुम्हे कोई एक व्यक्ति भी सहारा देने वाला नहीं मिलेगा ! तुम स्वयं को देख ही रहे हो, वैसे भी तुम्हारे साथ कोई नहीं,सदभाव में आओ और आनंद में आओ, दुर्भावना और दुर्भाग्य का त्याग करो ! सदभावना से सौभाग्य लिखा जाता है और दुर्भावना से दुर्भाग्य लिखा जाता है, तुम क्या लिखना चाहते हो अपने जीवन के लिए सुनिश्चित करो, मैं तुम्हारा सदगुरु तुम्हारे जीवन में सौभाग्य ही अंकित करना चाहता हूँ, इसलिए समय विशेष में सद्ज्ञान के माध्यम से तुम्हें पोषित करने की कोशिश करता हूँ……………

🌷🌷अभी भी समय है, आओ लौट चले स्वयं की ओर ! सदगुरु की ओर ! मैं उन सबका हूँ जो प्रेम में हैं और जो प्रेम में नहीं है उनसे कोई सम्बन्ध नहीं है हमारा, मैं प्रेम को शाश्वत दृष्टिकोण में देखता हूँ और जिसका शाश्वत से कोई लेना देना नहीं वह मेरा हो नहीं सकता, अमर प्रेम की अमर कहानी लिखने आया हूँ इस धरा पर, तुम साथी बन जाओगे तो अच्छा होगा, न बन पाओगे तो तुम्हारा अपना जीवन, मुझे कोई दुःख नहीं, सद्मार्ग की ओर हूँ, स्व की ओर हूँ, तुम्हारी दृष्टि में तुम भले ही न मुझे समझ पाओ ये तुम्हारे जीवन का अपना दोष, मैं तो बस मैं ही हूँ और मैं मेरी ओर हूँ……………..

🌷🌷तुम्हारी ओछी दृष्टि से तुम मुझे क्या समझ पाओगे, मुझे समझना ही है तो अंतर्जगत की यात्रा करो क्यूंकि सदगुरु अंतरचक्षु से ही समझ में आता है, चर्म चक्षुओं से सिर्फ संसार ही समझा जा सकता है और ये तुम्हारे जीवन का दुर्भाग्य की तुम आज तक चर्म चक्षुओं की यात्रा की है, तुम जीवन दर्शन की ओर बढे ही नहीं, तुम अकारण कभी आये ही नहीं मेरे पास, आये तो किसी न किसी इच्छा आकांक्षा को ले करके आये, उसे ही पूरा करने में तुम्हारे जीवन का सारा समय चला गया, तुम मुझे समझने के लिए आये कहा.? जब तुम मेरे पास आये न समझ पाये तो दूर बैठे तुम तुम सब मुझे क्या समझ पाओगे.? तुम मुझे समझ लो ये जरुरी ही नहीं है पर तुम स्वयं को समझ लो ये बहुत जरुरी बात है क्यूंकि बिना स्वयं की यात्रा पर निकले तुम्हारी जीवन यात्रा अधूरी है, तुम्हारी जीवन यात्रा पूरी हो ऐसी ही मेरी भावना है और ऐसी ही मेरी शुभकामना है……………

~ ब्रह्म स्वरूप पूज्य गुरुदेव श्री स्वामी कमालेश्वरानंद जी